आधुनिकता और परंपरा का टकराव
भारत की आर्थिक नियति वर्तमान में एक बड़े चौराहे पर खड़ी है। एक ओर सरकार का दावा है कि दशकों पुराने और "जंग लगे" श्रम कानूनों को हटाकर चार नई श्रम संहिताएं देश को 'विकसित भारत 2047' की ओर ले जाएंगी, वहीं दूसरी ओर देश के मजदूर संगठनों ने इसे "कॉरपोरेट के पक्ष में किया गया एकतरफा बदलाव" मानकर 12 फरवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का बिगुल फूंक दिया है। यह संघर्ष केवल वेतन या भत्तों का नहीं है, बल्कि यह इस बात का है कि भविष्य के भारत में 'श्रमिक' की परिभाषा क्या होगी और उसके अधिकारों की सीमा क्या होगी।

​विकास का तर्क: क्यों जरूरी हैं ये सुधार?
​सरकार और नीति विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत की पुरानी श्रम व्यवस्था निवेशकों को डराती थी। 29 अलग-अलग कानूनों के जाल में फंसे उद्यमी अक्सर भारत के बजाय वियतनाम या बांग्लादेश जैसे देशों को प्राथमिकता देते थे। चार संहिताओं में इन्हें संकलित करने का उद्देश्य प्रक्रिया को सरल बनाना है। इससे न केवल विदेशी निवेश (FDI) बढ़ेगा, बल्कि गिग इकॉनमी में काम करने वाले करोड़ों युवाओं को पहली बार सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जा सकेगा। सरकार का मानना है कि जब उद्योगों को काम करने की आजादी मिलेगी, तभी वे बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन कर पाएंगे।

​अधिकारों का संकट: श्रमिकों की आशंकाएं
​दूसरी तरफ, ट्रेड यूनियनों की चिंताएं भी निराधार नहीं हैं। नई संहिताओं में 'छंटनी' की सीमा को 100 कर्मचारियों से बढ़ाकर 300 करना छोटे और मध्यम उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए असुरक्षा पैदा करता है। सबसे बड़ी चिंता 'हड़ताल के अधिकार' को लेकर है। नए नियमों के अनुसार, अनिवार्य नोटिस अवधि और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं ने लोकतांत्रिक विरोध के इस अंतिम हथियार को लगभग कुंद कर दिया है। यूनियनों का कहना है कि यह सुधार श्रमिकों को 'बचाव' देने के बजाय उन्हें कॉरपोरेट जगत की दया पर छोड़ रहे हैं।

​इस हड़ताल में 'VB-GRAM G' योजना के विरोध ने आग में घी का काम किया है। जहाँ सरकार इसे ग्रामीण कौशल विकास और आधुनिक खेती की ओर एक कदम बता रही है, वहीं किसान संगठनों और यूनियनों का आरोप है कि यह मनरेगा (MGNREGA) जैसी जीवनदायिनी योजनाओं को कमजोर करने की साजिश है। उनका दावा है कि ग्रामीण भारत में काम के अवसरों को निजी हाथों में सौंपने से पलायन बढ़ेगा और स्थानीय रोजगार की गारंटी खत्म हो जाएगी। यही कारण है कि इस बार मजदूर और किसान एक ही मंच पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।

​मुंबई जैसे वित्तीय महानगर के लिए यह हड़ताल एक बड़ी चेतावनी है। बैंकिंग, बीमा और परिवहन के साथ-साथ आईटी सेक्टर के ठप होने से न केवल करोड़ों का नुकसान होगा, बल्कि वैश्विक बाजार में भारत की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे। हालाँकि, समाधान न तो पूर्णतः कानूनों को वापस लेने में है और न ही श्रमिकों की आवाज को दबाने में। आवश्यकता एक ऐसे 'मध्यम मार्ग' की है, जहाँ औद्योगिक विकास की गति भी न रुके और उस विकास की नींव में ईंट लगाने वाले श्रमिक का स्वाभिमान और सुरक्षा भी बरकरार रहे।

महिला कर्मचारियों की सुरक्षा पर जोर
एक सर्व के मुताबिक करीब 66 फीसदी कामगारों ने माना कि नए नियमों से महिला कर्मचारियों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी। सुरक्षा और परिवहन से जुड़े अनिवार्य प्रावधानों से कार्यस्थल ज्यादा सुरक्षित होंगे। 60 फीसदी श्रमिकों ने कहा कि छुट्टी से जुड़े नियम भी पहले से बेहतर होंगे। इससे काम और निजी जीवन के संतुलन में मदद मिलेगी। महिला भागीदारी बढ़ाने के लक्ष्य को भी इससे बल मिलने की बात कही गई है।

एक अप्रैल से लागू करने की तैयारी
केंद्र सरकार चारों श्रम कानून पहले ही अधिसूचित कर चुकी है। नियमों के मसौदे पर सुझाव भी मांगे जा चुके हैं। सरकार की योजना एक अप्रैल 2026 से इन्हें पूरी तरह लागू करने की है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने कहा कि इन सुधारों का लक्ष्य सभी के लिए सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक काम और समावेशी विकास को बढ़ावा देना है।

12 फरवरी की हड़ताल सरकार के लिए एक आईना है कि वह सुधारों की इस यात्रा में मुख्य हितधारकों को साथ लेकर चलने में कितनी सफल रही है। क्या यह सुधार वास्तव में 'सबका साथ' देंगे, या यह केवल 'पूंजी का विकास' बनकर रह जाएंगे?