कसमार के शशि शेखर ने किया कमाल
रांची। बोकारो के युवा पर्वतारोही शशि शेखर ने फिर झारखंड का मान बढ़ाया है। लद्दाख की 6,070 मीटर ऊंची, तकनीकी और दुर्गम चोटी ‘यूटी कांगड़ी-1’ को फतह कर तिरंगा फहरा दिया है।
यह चढ़ाई पर्वतारोहण की सबसे चुनौतीपूर्ण अल्पाइन स्टाइल में पूरी की। बिना किसी पोर्टर, शेर्पा या बाहरी सहायता के पूरी तरह आत्मनिर्भर अभियान के रूप में। शिखर पर पहुंचकर भारत का तिरंगा और झारखंड पर्यटन विभाग का झंडा फहराया, जिससे राज्य की साहसिक पर्यटन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्शाया जा सके।
अभियान की शुरुआत 13 जून को लेह से की थी। 14 जून को वे बेस कैंप पहुंचे और 15 जून की रात तीन बजे शिखर के लिए अंतिम चढ़ाई (समिट पुश) शुरू की। लगातार 5 घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद सुबह 7:50 बजे यूटी कांगड़ी-1 के शिखर को छू लिया। छूते ही वे रोमांच से भर गए।
नके साथ मित्र फुंसोग नामग्याल भी सहभागी थे। दोनों ने तेज हवाओं, न्यूनतम तापमान और बर्फ से ढकी तीखी ढलानों जैसी मुश्किल परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना करते हुए इस लक्ष्य को प्राप्त किया।
शशि शेखर ने कहा कि यह चढ़ाई मेरे लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत विजय नहीं थी, बल्कि झारखंड की पहचान को हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का एक प्रयास था।
इस अभियान का आयोजन झारखंड की प्रमुख साहसिक संस्था लैम्बडा ऐडवेंचर द्वारा किया गया, जो राज्य में ट्रेकिंग, राक क्लाइंबिंग, रैपलिंग और नेचर स्टडी कैंप्स जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं और स्कूली बच्चों को साहसिक गतिविधियों से जोड़ने का कार्य कर रही है।
अब शशि का दीर्घकालिक लक्ष्य है सेवन समिट चैलेंज, यानी दुनिया के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करना। अब तक वे इस मिशन में दो महाद्वीपों की चोटियां सफलतापूर्वक फतह कर चुके हैं, जिसमें माउंट अकोंकागुआ (दक्षिण अमेरिका) और माउंट एल्ब्रुस (यूरोप) है।
शशि शेखर की पूर्व की प्रमुख पर्वतारोहण उपलब्धियां
शशि शेखर इससे पूर्व भी कई प्रतिष्ठित पर्वत चोटियों को फतह कर चुके हैं
- माउंट अकोंकागुआ (6,961 मीटर) – दक्षिण अमेरिका की सबसे ऊंची चोटी (अर्जेंटीना)
- माउंट एल्ब्रुस (5,642 मीटर) – यूरोप की सबसे ऊंची चोटी (रूस)
- माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) – शशि इस चोटी पर अभियान के दौरान 8,430 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘बैलकनी’ तक पहुंचे
- माउंट लोबुचे ईस्ट (6,119 मीटर) – नेपाल
- माउंट मणिरंग (5,758 मीटर)– हिमाचल प्रदेश— जहां वे समिट कैंप तक पहुंचे
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