मुंबई : गोरेगांव के चर्चित लक्ष्मी डेवलपर्स के साझेदारों का बंटवारा विवाद अब उच्च न्यायालय की शरण में है। इस विवाद को लेकर कोठारी बंधु "भरत कोठारी और प्रवीण कोठारी" अब उच्च न्यायालय तक पहुंच गये हैं । अदालत ने 30 जुलाई 2025 को निर्देश दिया था कि यह मामला सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस.जे. काथावाला की मध्यस्थता में सुलझाया जाए। जिससे परियोजना से जुड़े रहवासियों का भविष्य एक बार फिर अधर में लटक गया है।



लक्ष्मी डेवलपर्स प्रोजेक्ट के तहत एसआरए (स्लम पुनर्विकास प्राधिकरण) से संबंधित सोसाइटियों का बंटवारे का विषय वर्षों से विवाद में अटका हुआ है। आरोप है कि डेवलपर्स ने दर्जनों प्रोजेक्ट्स में करार कर लिया परन्तु अपने आपसी मतभेद और कथित मिलीभगत की वजह से रहिवासियों को लंबे समय से उनके अधिकारों से वंचित रखा है।

पीड़ित रहिवासियों का कहना है कि कोठारी बंधुओं ने जानबूझकर अपना विवाद कोर्ट तक पहुंचाया ताकि सरकार और स्थानीय लोगों को अधिक से अधिक समय तक गुमराह किया जा सके। रहिवासी आरोप लगाते हैं कि यह एक प्रकार का छल है, जिसके चलते पिछले सात वर्षों से उनका पुनर्विकास कार्य अटका हुआ है। उनके अनुसार डेवलपर्स ने अपनी क्षमता से अधिक एसआरए प्रोजेक्ट्स में हाथ डाल दिया है और अब वे काम पूर्ण करने में असमर्थ हैं। साथ ही प्रोजेक्ट बंटवारे को लेकर भाइयों की  आपस में लड़ाई जनता खुले आम देखती आ रही है। और अब कोर्ट जाकर और अधिक समय खींचने का प्रयास कर रहें हैं।



स्थानीय सोसायटियों का आरोप है कि डेवलपर्स ने आपसी साठगांठ और मोटे मुनाफे के लिए सिस्टम से खेल रहा हैं। जिसमें इनका साथ कुछ भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी भी दे रहें है। इसलिए प्रशासन से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद समाधान नहीं निकल सका है। बढ़ती अनिश्चितता के चलते इलाके के रहिवासी अब विरोध की राह पर उतरने लगे हैं। क्योंकि इनसे प्रोजेक्ट की स्थिति पूछने पर विकासक भरत कोठारी कई बार अपना आपा खोकर, रहवासियों को अपने कार्यालय में अपमानित कर धक्के मारकर बाहर का रास्ता दिखा चुके हैं।

टेनेंट्स का सीधा आरोप है कि यह “डेवलपर द्वारा धोखाधड़ी” (Cheating) का मामला है। वर्षों से रिहायशी सुविधाओं का इंतजार कर रहे परिवार अब भविष्य को लेकर गहरी असुरक्षा महसूस कर रहे हैं। कई सोसायटियां एवं रहिवासी डेवलपर बदलने के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं।

हालांकि इसका समाधान कब तक निकल पाएगा, इस पर अनिश्चितता बनी हुई है। रहिवासियों को उम्मीद है कि प्रशासन और न्यायपालिका के हस्तक्षेप से उनका अधूरा सपना पूरा हो सकेगा।