महाराष्ट्र की राजनीति में 31 जनवरी का दिन एक ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दिग्गज नेता अजित पवार के आकस्मिक निधन के बाद, उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार ने राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर एक नई इबारत लिखी है। मराठवाड़ा के धाराशिव जिले के तेर गांव से ताल्लुक रखने वाली सुनेत्रा पवार का राजनीतिक जुड़ाव नया नहीं है; उनके पिता बाजीराव पाटिल अपने समय के प्रभावशाली नेता रहे हैं। 1985 में अजित पवार से विवाह के बाद, उन्होंने दशकों तक खुद को सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर रखा, लेकिन पर्दे के पीछे वह हमेशा अपने पति की सबसे भरोसेमंद सलाहकार और संगठन की मजबूत कड़ी बनी रहीं।

सुनेत्रा पवार की पहचान केवल एक राजनीतिक परिवार की बहू के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रबुद्ध सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर भी रही है। वाणिज्य (Commerce) स्नातक सुनेत्रा ने कला, संगीत और कृषि के क्षेत्र में अपनी रुचि को कभी कम नहीं होने दिया। साल 2010 में उन्होंने 'एंवायरनमेंट फोरम ऑफ इंडिया' (EFOI) की नींव रखी, जिसके माध्यम से उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास के कार्यों को नई दिशा दी। उनके नेतृत्व में बारामती के काटेवाडी गांव को 'इको-विलेज' के रूप में विकसित किया गया, जो आज स्वच्छता, सौर ऊर्जा और कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में एक आदर्श मॉडल माना जाता है। उन्होंने स्वयं-सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी अहम भूमिका निभाई है।

उनका सक्रिय राजनीतिक पदार्पण 2024 के लोकसभा चुनावों में हुआ, जो उनके जीवन की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक था। बारामती सीट पर उनका मुकाबला अपनी ही ननद और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले से था। हालांकि इस 'पवार बनाम पवार' की लड़ाई में उन्हें डेढ़ लाख से अधिक वोटों से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन इस चुनाव ने उन्हें जनता के बीच एक जननेता के रूप में स्थापित कर दिया। चुनाव के बाद, अजित पवार ने उन्हें राज्यसभा भेजकर संसदीय राजनीति का अनुभव दिलाया, जिससे उनके भविष्य की बड़ी भूमिका के संकेत पहले ही मिल गए थे।

अब 62 वर्ष की आयु में, पति के जाने के बाद पार्टी और परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई है। उपमुख्यमंत्री का पद संभालना उनके लिए केवल एक संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एनसीपी (अजित पवार गुट) के अस्तित्व को बचाए रखने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की एक बड़ी चुनौती भी है। एक ओर जहां उन्हें प्रशासन की बारीकियों को समझना होगा, वहीं दूसरी ओर उन्हें अपनी सामाजिक छवि और प्रशासनिक दूरदर्शिता का उपयोग कर महाराष्ट्र के विकास में योगदान देना होगा। राज्य की पहली महिला डिप्टी सीएम के रूप में उनकी कार्यशैली पर अब पूरे देश की नजरें टिकी होंगी।