रामायण काल का रहस्यमयी मंदिर! कपिल मुनि के सामने प्रकट हुए थे महादेव, विद्यापति-जनक से जुड़ा अद्भुत इतिहास
मिथिला की पावन धरती केवल कला के लिए ही नहीं, बल्कि अपने कतरे-कतरे में दबे आध्यात्मिक रहस्यों के लिए भी जानी जाती है. मधुबनी जिले के रहिका प्रखंड में स्थित कपिलेश्वर स्थान एक ऐसा ही दिव्य धाम है. जिसका इतिहास सतयुग और त्रेतायुग की कड़ियों को आपस में जोड़ता है. यहां स्थापित शिवलिंग को किसी मनुष्य ने स्थापित नहीं किया, बल्कि यह स्वयं धरती से अंकुरित हुए हैं.
कपिल मुनि और प्रकट शिवलिंग का रहस्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार इस मंदिर का नाम महान संत कपिल मुनि के नाम पर पड़ा. जब कपिल मुनि राजा जनक के निमंत्रण पर माता सीता और प्रभु श्रीराम के विवाह में शामिल होने जनकपुर जा रहे थे, तब उन्होंने रहिका के इसी घने जंगल में रात्रि विश्राम किया था. मध्यरात्रि में जब मुनि की आंख खुली, तो उन्होंने एक विस्मयकारी दृश्य देखा. एक काली गाय अपने थन से दूध की धार एक चमकते हुए काले पत्थर पर गिरा रही थी. जैसे ही मुनि पास पहुंचे, गाय ओझल हो गई. खुदाई करने पर वहां से एक तेजस्वी शिवलिंग प्रकट हुआ. कपिल मुनि ने वहां शिव की आराधना की. जिसके बाद इस स्थान का नाम कपिलेश्वर प्रसिद्ध हुआ.
राजा जनक के चतुष्कोण का रक्षक
मंदिर के पुजारी भगवान झा पांडा बताते हैं कि इस मंदिर के साथ कई पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं. माना जाता है कि राजा जनक के नेपाल स्थित जानकी भवन के चारों कोनों पर शिव मंदिर स्थित हैं. जिनमें से एक कोण पर यह कपिलेश्वर स्थान विराजमान है. कहा जाता है कि माता सीता की विदाई के बाद अयोध्या लौटते समय प्रभु श्रीराम ने भी यहां रात्रि विश्राम किया था, जिसे आज भी एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है.
महाकवि विद्यापति का जन्म और बाबा का आशीर्वाद
इस मंदिर का एक बड़ा इतिहास मैथिली कोकिल विद्यापति से भी जुड़ा है. मान्यता है कि विद्यापति के पिता गणपति ठाकुर को कोई संतान नहीं थी. वे बाबा बैद्यनाथ की शरण में गए, जहां भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि वे अपने घर के समीप स्थित कपिलेश्वर बाबा की सेवा करें. बाबा के आशीर्वाद से ही महापंडित विद्यापति का जन्म हुआ. वही विद्यापति, जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव उगना बनकर उनके घर नौकरी करने आए थे.
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