अदालत के आदेश पर टिकीं निगाहें, निदा खान की जमानत पर अहम सुनवाई
नासिक। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) से जुड़े कथित उत्पीड़न और जबरन मत परिवर्तन के मामले में गिरफ्तार कर्मचारियों, निदा खान और दानिश शेख, की जमानत याचिकाओं पर आगामी 25 जून को निर्णय आने की उम्मीद है। अदालत ने मामले से जुड़े दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। कई गंभीर आरोपों और प्राथमिकियों के चलते सुर्खियों में आए इस मामले में न्यायालय का यह आगामी आदेश आगे की कानूनी दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
नासिक रोड स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायालय के न्यायाधीश के.जी. जोशी के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता राहुल कसलीवाल ने निदा खान की गर्भावस्था का हवाला देते हुए मानवीय आधार पर जमानत की मांग की, जबकि दानिश शेख के वकील उमेश वालजाडे ने तर्क दिया कि चूंकि जांच पूरी हो चुकी है, इसलिए अब उनके मुवक्किल को न्यायिक हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरी तरफ, सरकारी अभियोजक विजय गायकवाड़ ने इन याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए दलील दी कि जांच में आरोपियों के खिलाफ गंभीर साक्ष्य मिले हैं, जिनमें अनुसूचित जाति की पीड़िता को कथित रूप से धार्मिक पुस्तकें और बुर्का देने जैसी बातें शामिल हैं। अभियोजन ने इसे महज एक आपसी विवाद न मानकर सोचे-समझे वैचारिक व मानसिक दबाव का हिस्सा बताया।
पीड़िता की सुरक्षा और दबाव की आशंका
सरकारी वकीलों और पीड़िता के विधिक प्रतिनिधियों ने अदालत के सामने अपनी मुख्य चिंता सुरक्षा को लेकर जाहिर की। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि यदि इस मोड़ पर आरोपियों को जमानत का लाभ मिलता है, तो वे बाहर आकर पीड़िता को डरा-धमका सकते हैं और साक्ष्यों को प्रभावित करने का प्रयास कर सकते हैं। इसी आधार पर न्यायालय से दोनों ही याचिकाओं को निरस्त करने का आग्रह किया गया, जिसके बाद अदालत ने निर्णय सुरक्षित रख लिया।
एसआईटी की जांच और कंपनी का रुख
वर्तमान में इस पूरे विवाद से जुड़े कुल नौ मामलों की कमान विशेष जांच दल (एसआईटी) के हाथों में है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं, जिनमें छेड़छाड़, मानसिक प्रताड़ना और धार्मिक भावनाएं आहत करने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। इस बीच, टीसीएस प्रबंधन ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार के खिलाफ 'शून्य सहिष्णुता' (जीरो टॉलरेंस) की नीति अपनाती है, और इसी के तहत आरोपी कर्मचारियों को पहले ही नौकरी से निलंबित किया जा चुका है।
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