नंगल। उत्तर भारत की जीवन रेखा माने जाने वाले भाखड़ा बांध के जलस्तर में पिछले दो हफ्तों के दौरान 22 फीट की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वर्तमान में बांध का जलस्तर पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 13 फीट पीछे चल रहा है। इस बार कमजोर मॉनसून की वजह से बांध में पानी की आवक बेहद धीमी है, जिसने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के सिंचाई और बिजली विभागों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं।

बीबीएमबी के आंकड़ों में जलस्तर की सुस्त रफ्तार

भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) द्वारा जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, करीब 14 दिन पहले बांध का जलस्तर 1558 फीट पर था, जो अब बढ़कर 1580 फीट तक पहुंच सका है। इस समय बांध में पानी की आवक 40,426 क्यूसेक दर्ज की जा रही है, जबकि भागीदार राज्यों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बांध से 26,146 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। पिछले साल आज ही के दिन बांध का जलस्तर 1593 फीट दर्ज किया गया था, जो मौजूदा स्तर से काफी बेहतर स्थिति को दर्शाता है।

चार राज्यों में मंडराया गहरा जल और बिजली संकट

उत्तर भारत में मॉनसून की सुस्त चाल के कारण जून और जुलाई के महीनों में उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं हुई है। पिछले साल बांध का जलस्तर कई मौकों पर खतरे के निशान तक पहुंच गया था, जिससे पूरे साल चारों राज्यों को पर्याप्त पानी और बिजली मिलती रही। लेकिन इस साल यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं होती है, तो पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और चंडीगढ़ में पीने के पानी, फसलों की सिंचाई और पनबिजली उत्पादन पर इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है।

पौंग बांध के हालात भी बेहद चिंताजनक

भाखड़ा के साथ-साथ पौंग बांध के जलस्तर में भी इस बार बड़ी गिरावट देखी जा रही है। वर्तमान में पौंग बांध का जलस्तर 1322 फीट दर्ज किया गया है, जो कि पिछले साल की तुलना में 6 फीट कम है, क्योंकि पिछले वर्ष इसी दिन यह 1328 फीट के स्तर पर था। पिछले साल दोनों ही बांधों में पानी की रिकॉर्ड आवक दर्ज की गई थी, जिसने 1988 की बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दिए थे, लेकिन इस बार दोनों मुख्य जलाशयों में पानी की भारी कमी साफ दिखाई दे रही है।

अंतरराज्यीय जल विवाद गहराने की आशंका

बांधों में पानी की इस कमी का सीधा असर आने वाले समय में भागीदार राज्यों के आपसी संबंधों पर भी पड़ सकता है। यदि बांधों में पर्याप्त पानी जमा नहीं होता है, तो राज्यों को की जाने वाली जल आपूर्ति में कटौती करनी पड़ेगी। पानी की आपूर्ति कम होने से फसलों को भारी नुकसान पहुंचेगा और इससे पंजाब तथा हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों के बीच पुराना जल विवाद एक बार फिर उग्र रूप ले सकता है, जिससे निपटने के लिए बोर्ड के अधिकारी लगातार बैठकों का दौर जारी रखे हुए हैं।