सोना बेचने की सोच रहे हैं? एक गलती करा सकती है बड़ा नुकसान, समझें पूरा खेल
नई दिल्ली। भारत में पारंपरिक और आधुनिक रूप से सोने में निवेश को हमेशा से सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद माना जाता रहा है। हालांकि, निवेशक अक्सर खरीदारी के समय तो काफी सावधानी बरतते हैं, लेकिन जब इसी सोने को बाजार में बेचने की बारी आती है, तो टैक्स का असली पेंच सामने आता है। वित्तीय विशेषज्ञों की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, सोना बेचने पर आपको कितना टैक्स चुकाना होगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आपने निवेश किस माध्यम से किया था। फिजिकल ज्वेलरी, गोल्ड ईटीएफ, डिजिटल गोल्ड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, इन चारों रूपों में टैक्स के नियम अलग-अलग हैं, जिसके चलते एक ही कीमत पर खरीदे गए सोने पर अलग-अलग टैक्स का बोझ पड़ सकता है।
फिजिकल गोल्ड और ज्वेलरी पर लागू होने वाले कड़े नियम
परंपरागत रूप से खरीदे जाने वाले फिजिकल गोल्ड यानी सोने के आभूषण, सिक्के या बिस्कुट को बेचने पर टैक्स के नियम काफी सख्त माने जाते हैं। यदि कोई निवेशक अपनी फिजिकल ज्वेलरी या सिक्कों को खरीदने की तारीख से लेकर 24 महीनों के भीतर ही बाजार में बेच देता है, तो इससे होने वाले पूरे मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) माना जाता है। इस स्थिति में यह मुनाफा निवेशक की कुल सालाना आय में जोड़ दिया जाता है और व्यक्ति जिस भी टैक्स स्लैब के अंतर्गत आता है, उसे उसी दर से टैक्स का भुगतान करना पड़ता है।
लंबी अवधि के निवेश पर मिलने वाली आंशिक राहत
यदि फिजिकल गोल्ड को 24 महीने या उससे अधिक समय तक अपने पास रखने के बाद बेचा जाता है, तो वित्तीय नियमों के तहत इसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) की श्रेणी में रखा जाता है। लंबी अवधि के इस निवेश से होने वाले मुनाफे पर सरकार द्वारा निर्धारित की गई 12.5% की दर से फ्लैट टैक्स वसूला जाता है। ऐसे में जो निवेशक ऊंचे टैक्स स्लैब में आते हैं, उनके लिए 24 महीने के बाद फिजिकल गोल्ड बेचना शॉर्ट टर्म में बेचने के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद और टैक्स की दृष्टि से किफायती साबित होता है।
डिजिटल गोल्ड और ईटीएफ में निवेश के अलग गणित
आधुनिक दौर में भौतिक रूप से सोना रखने के बजाय लोग डिजिटल गोल्ड, गोल्ड म्यूचुअल फंड या गोल्ड ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड) में निवेश करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। हालांकि, इन डिजिटल माध्यमों को भुनाने या बेचने पर भी टैक्स के नियम फिजिकल गोल्ड से थोड़े भिन्न हो सकते हैं। इनमें किए गए निवेश की अवधि और होल्डिंग पीरियड के आधार पर ही टैक्स देनदारी तय की जाती है, इसलिए किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सोना खरीदने से पहले उसके लिक्विडेशन और टैक्स प्रावधानों को अच्छे से समझ लेना बेहद जरूरी है।
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में टैक्स छूट का विशेष लाभ
टैक्स बचाने के लिहाज से सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) को निवेशकों के लिए सबसे बेहतरीन माध्यम माना जाता है। इस सरकारी योजना के तहत यदि कोई निवेशक बॉन्ड को उसकी मैच्योरिटी की पूरी अवधि यानी 8 साल तक अपने पास रखता है, तो मैच्योरिटी के समय मिलने वाले पूरे कैपिटल गेन पर सरकार द्वारा शत-प्रतिशत टैक्स छूट दी जाती है। यही कारण है कि यह माध्यम उन लोगों के लिए सबसे ज्यादा मुनाफे वाला सौदा साबित होता है जो टैक्स का बोझ उठाए बिना सोने में लंबी अवधि के लिए निवेश करना चाहते हैं।
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