Everest Base Camp पर पहुंचा झारखंड का लाल....
देवघर। माउंट एवरेस्ट दुनिया की सबसे उंची चोटी है। एवरेस्ट पर चढ़ाई करना हर पर्वतारोही का सपना होता है। ये चढ़ाई जितना उंचा है, उतना ही कठिन भी। इस माउंट एवरेस्ट का के बेस कैंप तक की चढ़ाई भी काफी कठिन है। हालांकि, बेस कैंप तक की चढ़ाई हर वर्ष काफी लोग करते हैं।
देवघर के न्यूरो सर्जन डॉ. अविनाश कुमार एवरेस्ट बस कैंप तक की सफल चढ़ाई पूरी कर ली है। वे दस दिन की कठिन चढ़ाई के बाद शनिवार को एवरेस्ट के बेस कैंप पर सफलतापूर्वक पहुंच गए। वहां से उन्होंने हाथ में तिरंगा थामे जो तस्वीर भेजी उसमें उनके चेहरे पर खुशी और गर्व दोनों साफ नजर आ रहा था।
वे जहां खड़े थे, उसके पीछे बर्फ से लदा माउंड एवरेस्ट साफ नजर आ रहा था। एवरेस्ट बेस कैंप की उंचाई 5364 मीटर यानी 17,598 फीट है। इसकी चढ़ाई नेपाल से शुरू होती है। इस चढ़ाई तक नेपाल के कुशल सेरपा के देख-रेख में पूरा कराया जाता है। इस दौरान करीब 120 किमी का पैदल रास्ता तय करना पड़ता है।
ये यात्रा काफी कठिनाइयों से भरा हुआ है और कई जोखिम को उठाते हुए पर्वतारोही यहां तक पहुंचते हैं। रास्ते की कठिनाई के साथ ही कई बार मौसम की बेरुखी भी झेलनी पड़ती है। इतनी उंचाई पर तापमान भी काफी कम रहता है और आक्सीजन की भी कमी महसूस होती है, लेकिन वहां पर पहुंचकर जब माउंट एवरेस्ट को करीब से दिरार करते हैं तो सारी कठिनाई व कष्ट दूर हो जाता है।
एवरेस्ट बेस कैंप से डॉ. अविनाश कुमार ने भेजा ये संदेश
एवरेस्ट बेस कैंप से डॉ. अविनाश कुमार ने मैसेज भेजा है कि यहां पहुंचकर वे काफी गर्व महसूस कर रहे थे। वे काफी वर्षों से यहां तक पहुंचने का सपना देख रहे थे। आज उनका ये सपना साकार हो गया। इस सफल चढ़ाई से वे और उनकी पूरी टीम काफी खुश है। आमताैर पर यहां तक पहुंचने में दो सप्ताह का समय लगता है, लेकिन उन्होंने ये दूरी दस दिनों में तय की है।
डॉ. अविनाश कुमार ने बताया कि हिमालय की चोटी के इतने करीब पहुंचने पर तो दृश्य नजर आया वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। ये एक ऐसा अनुभव है, जिसे वे पूरी जिंदगी कभी भूला नहीं पाएंगे। आज का दिन उनके जीवन के सबसे खुशी के दिन में से एक है।
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