इस्लामाबाद: ईरान के साथ बढ़ते वैश्विक तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय दांव खेला है, जिसने पाकिस्तान को बेहद धर्मसंकट की स्थिति में डाल दिया है। अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान पर 'अब्राहम अकॉर्ड' (Abraham Accords) का हिस्सा बनने और इजरायल को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने के लिए चौतरफा दबाव बनाया जा रहा है। ट्रंप का साफ कहना है कि ईरान के साथ भविष्य में किसी भी टिकाऊ शांति समझौते के लिए पाकिस्तान का इस गठबंधन में शामिल होना बेहद जरूरी है। अमेरिकी राष्ट्रपति की इस शर्त ने पाकिस्तान के सामने 'आगे कुआं, पीछे खाई' जैसी स्थिति पैदा कर दी है।

ट्रंप का मुस्लिम देशों को कड़ा संदेश, अब्राहम अकॉर्ड को बताया जरूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' के जरिए साफ किया कि मध्य-पूर्व के सभी प्रमुख मुस्लिम राष्ट्रों को हर हाल में इजरायल के साथ अपने राजनयिक संबंधों को सामान्य करना होगा। ट्रंप ने इस कूटनीतिक योजना को एक 'जटिल पहेली' का समाधान बताते हुए दावा किया कि जो देश पहले से इस समझौते का हिस्सा हैं, उन्हें बड़ा आर्थिक और सामाजिक फायदा मिला है। इस भंवर में फंसे पाकिस्तान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अमेरिका को नाराज भी नहीं कर सकता और इजरायल से हाथ मिलाना भी उसके लिए आसान नहीं है।

इजरायल से हाथ मिलाया तो बदलना होगा पासपोर्ट का 78 साल पुराना नियम

यदि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेकते हुए इजरायल से रिश्ते बनाने के लिए तैयार भी होता है, तो उसके सामने बड़ा कानूनी और प्रशासनिक संकट खड़ा हो जाएगा। अपनी स्थापना के बाद से पिछले 78 वर्षों में पाकिस्तान ने कभी भी इजरायल को मान्यता नहीं दी है, यही वजह है कि पाकिस्तानी पासपोर्ट पर स्पष्ट रूप से अंकित है कि 'यह पासपोर्ट इजरायल को छोड़कर दुनिया के सभी देशों के लिए वैध है'। अब्राहम अकॉर्ड पर हस्ताक्षर करने की स्थिति में पाकिस्तान को न सिर्फ अपने इस बुनियादी नियम को बदलना होगा, बल्कि वीजा, इमिग्रेशन और दूतावास से जुड़े सभी कानूनों में फेरबदल करना पड़ेगा, जो वहां की सरकार के लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है।

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का पलटवार, समझौते से किया साफ इनकार

अमेरिका की इस घेराबंदी पर पाकिस्तान ने फिलहाल कड़ा रुख अपनाते हुए ट्रंप के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक इंटरव्यू में अपनी नाराजगी जताते हुए कहा कि देश को ऐसे किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बनना चाहिए जो उसकी बुनियादी विचारधारा और सिद्धांतों के खिलाफ हो। उन्होंने सवाल उठाया कि वे ऐसे लोगों के साथ चर्चा की मेज पर कैसे बैठ सकते हैं, जिनकी विश्वसनीयता और वादों पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता।

आर्थिक कंगाली और अमेरिकी मदद के बीच फंसा भविष्य

पाकिस्तानी नेतृत्व भले ही बयानबाजी में कड़ा रुख दिखा रहा हो, लेकिन देश की आर्थिक हकीकत किसी से छुपी नहीं है। दिवालिया होने की कगार पर खड़ा पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए पूरी तरह से अमेरिकी वित्तीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के बेलआउट पैकेज पर निर्भर है। ऐसे में ट्रंप द्वारा इजरायल की मान्यता का पेंच फंसाए जाने के बाद पाकिस्तान इस अंतरराष्ट्रीय चक्रव्यूह और अपनी घरेलू बगावत के डर से कैसे उबर पाता है, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।